Why The 2-6-10 Loan Rule May No Longer Work For Modern Borrowers
डिजिटल बैंकिंग और बढ़ती जीवन-यापन लागत के दौर में लोन लेने के पुराने नियम अब पूरी तरह व्यावहारिक नहीं रह गए हैं। वित्तीय विशेषज्ञों का कहना है कि कभी जिम्मेदार उधारी के लिए लोकप्रिय रहा 2-6-10 नियम आज के समय में कई परिवारों की आर्थिक वास्तविकताओं से मेल नहीं खाता।
क्या है 2-6-10 नियम?
यह पारंपरिक नियम लोन लेने के लिए तीन सीमाएं बताता था। इसके अनुसार किसी वस्तु की कीमत आपकी मासिक आय के आधे से अधिक नहीं होनी चाहिए, लोन की अवधि छह महीने के भीतर होनी चाहिए और EMI आपकी मासिक आय के 10 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। यह नियम मूल रूप से छोटे उपभोक्ता खर्चों को नियंत्रित करने और जल्दी भुगतान को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया था।
बढ़ता घरेलू कर्ज
भारतीय रिजर्व बैंक की फाइनेंशियल स्टेबिलिटी रिपोर्ट के अनुसार भारत में घरेलू कर्ज लगातार बढ़ रहा है। यह 2021 के मध्य में GDP के लगभग 36 प्रतिशत से बढ़कर 2025 की शुरुआत तक करीब 41.3 प्रतिशत तक पहुंच गया। इसी अवधि में पर्सनल लोन और क्रेडिट कार्ड जैसे रिटेल लोन तेजी से बढ़े हैं।
क्यों बदल रही है सोच
विशेषज्ञों के अनुसार 2-6-10 नियम की सबसे बड़ी कमी यह है कि यह आय के कुल आंकड़े पर आधारित है, जबकि वास्तविक खर्च और बचत हर व्यक्ति के लिए अलग होती है। दो लोगों की आय समान होने के बावजूद उनके खर्च अलग-अलग हो सकते हैं, जिससे EMI का दबाव भी अलग हो सकता है।
अब क्या सलाह देते हैं विशेषज्ञ?
वित्तीय सलाहकारों के मुताबिक कुल EMI आपकी नेट टेक-होम आय के 30–35 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए। इसके अलावा कम से कम छह महीने का इमरजेंसी फंड रखना और EMI के बाद भी आय का 15–20 प्रतिशत बचत करना जरूरी माना जाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि बैंक भले ही ज्यादा लोन की मंजूरी दे दें, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या वह लोन आपकी आर्थिक स्थिति के हिसाब से वास्तव में किफायती है।
