नो-कॉस्ट EMI का सच: ‘ब्याज मुक्त’ ऑफर कैसे पड़ सकता है महंगा

by cityplusnews · February 24, 2026
Share This News

“अभी खरीदें, बाद में चुकाएं – बिना ब्याज के।” यह ऑफर सुनने में आकर्षक लगता है, खासकर जब आप महंगा स्मार्टफोन या इलेक्ट्रॉनिक सामान खरीद रहे हों। लेकिन वित्तीय विशेषज्ञों के अनुसार, तथाकथित “नो-कॉस्ट EMI” उतनी मुफ्त नहीं होती जितनी दिखती है।

नो-कॉस्ट EMI क्या है?

मान लीजिए किसी फोन की कीमत ₹30,000 है और आप 6 महीने की नो-कॉस्ट EMI चुनते हैं। आप हर महीने ₹5,000 चुकाते हैं। कुल भुगतान ₹30,000 ही रहता है, जिससे लगता है कि ब्याज नहीं लिया गया।

दरअसल, बैंक ब्याज वसूलता है, लेकिन विक्रेता उतनी ही राशि का डिस्काउंट देकर उसे समायोजित कर देता है। इस कारण ग्राहक अतिरिक्त कैशबैक या अन्य छूट से वंचित हो सकता है।

छिपे हुए शुल्क

कई योजनाओं में प्रोसेसिंग फीस शामिल होती है, जो बाद में क्रेडिट कार्ड स्टेटमेंट में दिखाई देती है। साथ ही, ब्याज राशि पर 18% जीएसटी भी लगता है, जिससे कुल लागत बढ़ जाती है।

क्रेडिट स्कोर पर असर

हर EMI एक लोन की तरह मानी जाती है। कई वस्तुएं EMI पर लेने से आपकी कुल क्रेडिट देनदारी बढ़ती है और TransUnion CIBIL स्कोर प्रभावित हो सकता है। भुगतान में देरी होने पर लेट फीस और पेनल्टी ब्याज भी जुड़ जाता है।

ओवरस्पेंडिंग का जोखिम

आसान किश्तें अक्सर जरूरत से महंगा सामान खरीदने के लिए प्रेरित करती हैं। 12 या 24 महीनों की लंबी अवधि भविष्य में वित्तीय दबाव बना सकती है।

कब फायदेमंद हो सकती है EMI?

यदि खरीदारी जरूरी हो और मासिक किस्तें आपके बजट में आराम से फिट हों, तो EMI उपयोगी हो सकती है। लेकिन शर्तों को ध्यान से पढ़ना और नकद कीमत से तुलना करना जरूरी है।

निष्कर्ष:
नो-कॉस्ट EMI वास्तव में एक ऋण सुविधा है, मुफ्त ऑफर नहीं। सुविधा के साथ-साथ इसके छिपे खर्च और लंबी वित्तीय प्रतिबद्धताओं को समझना बेहद जरूरी है।

डिस्क्लेमर: यह लेख केवल जानकारी के उद्देश्य से है। किसी भी EMI योजना का चयन करने से पहले शर्तों की समीक्षा करें और वित्तीय सलाहकार से परामर्श लें।

You may also like