Madhyamaheshwar Mahadev Temple in Uttarakhand: A Sacred Panch Kedar Shrine Where Heaven is Experienced on Earth
उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है, क्योंकि यहां हर पहाड़ी और घाटी में दिव्य आस्था छिपी है। गढ़वाल हिमालय में स्थित मदमहेश्वर महादेव मंदिर उन्हीं पवित्र स्थलों में से एक है। रुद्रप्रयाग जिले की मंदाकिनी घाटी में बसा यह मंदिर समुद्र तल से लगभग 11,473 फीट (3,497 मीटर) की ऊंचाई पर स्थित है। मंदिर की पहचान न केवल पंचकेदारों में से एक होने के कारण है, बल्कि यहां की अद्भुत प्राकृतिक सुंदरता और धार्मिक मान्यता इसे खास बनाती है।
पंचकेदार की कथा: कैसे बने भगवान शंकर बारहवें ज्योतिर्लिंग
पंचकेदार में प्रथम केदार भगवान केदारनाथ हैं, जिन्हें बारहवें ज्योतिर्लिंग के रूप में भी जाना जाता है। इसके बाद द्वितीय केदार मद्महेश्वर, तृतीय केदार तुंगनाथ, चतुर्थ केदार रुद्रनाथ और पंचम केदार कल्पेश्वर माने जाते हैं।
पांडव और पंचकेदार की उत्पत्ति
पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार, महाभारत युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद पांडव भ्रातृहत्या और गोत्रहत्या जैसे पापों से मुक्ति पाना चाहते थे। इसके लिए वे भगवान शंकर का आशीर्वाद लेना चाहते थे, लेकिन भगवान शंकर उनसे प्रसन्न नहीं थे और दर्शन नहीं देना चाहते थे।
पांडवों को खोजते हुए शिवजी हिमालय पहुंचे और केदार में बैल का रूप धारण कर अन्य पशुओं के बीच छुप गए। पांडवों को संदेह हुआ तो भीम ने विशाल रूप धारण कर दो पहाड़ों पर पैर फैला दिए। सभी पशु नीचे से निकल गए, लेकिन भगवान शंकर रूपी बैल जाने को तैयार नहीं हुए और धरती में समाने लगे। तभी भीम ने बैल की पीठ पकड़ ली। उसी क्षण शिवजी प्रकट हुए और पांडवों को दर्शन देकर उनके पापों से मुक्ति प्रदान की।
मंदिर से जुड़ा पौराणिक इतिहास
पौराणिक कथाओं के अनुसार, महाभारत के युद्ध के बाद पांडव भाई अपने पापों का प्रायश्चित करना चाहते थे। उन्होंने भगवान शिव की तपस्या की, लेकिन शिवजी उनसे रुष्ट होकर छुपने लगे। कहा जाता है कि वे बैल (नंदी) के रूप में धरती में समा गए।
- केदारनाथ में उनकी पीठ पूजित हुई।
- तुङ्नाथ में उनकी भुजाएँ।
- रुद्रनाथ में उनका मुख।
- कल्पेश्वर में उनके जटाएं।
- और मदमहेश्वर में उनका मध्यभाग पूजित होता है।
इस कारण इन पांचों मंदिरों को मिलाकर “पंचकेदार” कहा जाता है।

मदमहेश्वर महादेव मंदिर की खासियत और मान्यता
माना जाता है कि यह मंदिर महाभारत काल से जुड़ा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, पांडवों ने अपने पापों से मुक्ति पाने के लिए भगवान शिव की आराधना की थी। उस समय शिवजी विभिन्न स्थानों पर प्रकट हुए और जिन-जिन जगहों पर उनकी आकृतियां उभरीं, वहीं पंचकेदार मंदिरों की स्थापना हुई। मदमहेश्वर में शिवजी का मध्यभाग पूजित होता है।
मंदिर की वास्तुकला भी अनोखी है। यहां परंपरागत उत्तराखंडी शैली में पत्थरों से निर्मित गर्भगृह और मंडप हैं। मंदिर परिसर में बर्फ से ढकी चोटियां, हरियाली और शांत वातावरण मिलकर एक दिव्य आभा का अनुभव कराते हैं।
विशेष धार्मिक मान्यता
माना जाता है कि मद्महेश्वर में भगवान शंकर के मध्यभाग के दर्शन होते हैं। यहां की पूजा भी दक्षिण भारत के पुजारियों द्वारा परंपरागत विधि से की जाती है, जैसे केदारनाथ में होती है।
यहां का जल अत्यंत पवित्र माना जाता है। मान्यता है कि इसकी कुछ बूंदें भी मोक्ष प्राप्ति के लिए पर्याप्त हैं। अन्य पंचकेदार मंदिरों की तरह, यहां भी शीतकाल में छह माह के लिए कपाट बंद कर दिए जाते हैं और भगवान की पूजा उखीमठ में ओंकारेश्वर मंदिर में होती है।
मंदिर की विशेषताएँ
- मंदिर पत्थरों से बनी प्राचीन उत्तराखंडी स्थापत्य शैली में निर्मित है।
- गर्भगृह में शिवलिंग परंपरागत ढंग से स्थापित है।
- मुख्य मंदिर के साथ ही यहां छोटे मंदिर भी हैं, जिनमें पार्वती माता और अन्य देवी-देवताओं की पूजा होती है।
- आसपास बर्फ से ढकी चौखंबा और केदार शिखर जैसी ऊँची पर्वत चोटियाँ मंदिर को और भी भव्य बनाती हैं।
दर्शन और यात्रा का सही समय
मदमहेश्वर महादेव मंदिर के कपाट मई से नवंबर तक खुले रहते हैं।
- इस अवधि में यहां का मौसम सुहावना और यात्रा योग्य रहता है।
- नवंबर के बाद बर्फबारी के कारण कपाट बंद कर दिए जाते हैं और भगवान की पूजा-आराधना उखीमठ स्थित ओंकारेश्वर मंदिर में होती है।
- अप्रैल-मई में कपाट पुनः खोल दिए जाते हैं।
कैसे पहुंचे?
- सड़क मार्ग: रुद्रप्रयाग से उखीमठ, फिर रांसी गांव तक सड़क से पहुंचा जा सकता है।
- पैदल मार्ग: रांसी से मंदिर तक करीब 16-18 किलोमीटर की पैदल यात्रा करनी होती है। यह यात्रा जंगलों, हरे-भरे घास के मैदानों और झरनों के बीच से गुजरती है।
- निकटतम हवाई अड्डा: जॉली ग्रांट एयरपोर्ट, देहरादून (लगभग 220 किमी दूर)
- निकटतम रेलवे स्टेशन: ऋषिकेश (लगभग 200 किमी दूर)
ट्रेकिंग अनुभव
मदमहेश्वर की यात्रा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि रोमांचक भी है। रांसी से बंटोली और नन्नू जैसे ठहराव बिंदुओं पर लोग विश्राम करते हैं। पैदल रास्ते में स्थानीय गाँवों की संस्कृति, पहाड़ी व्यंजन और लोककला यात्रियों को एक अलग ही अनुभव कराते हैं। रास्ते में घोड़े-खच्चर की सुविधा भी उपलब्ध रहती है।
स्थानीय संस्कृति और मेले
मंदिर खुलने और बंद होने के अवसर पर बड़े धार्मिक मेले आयोजित होते हैं। स्थानीय लोग पारंपरिक वाद्य यंत्र बजाकर और नृत्य प्रस्तुत कर भगवान शिव की आराधना करते हैं। इन अवसरों पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है।
क्यों खास है यह धाम?
- धार्मिक मान्यता है कि यहां आने से व्यक्ति स्वर्ग के समान दिव्यता का अनुभव करता है।
- हिमालय की बर्फीली चोटियाँ, हरे-भरे बुग्याल और प्राकृतिक झरने इस स्थान को स्वर्गिक आभा देते हैं।
- यह स्थान आस्था, रोमांच और प्रकृति का अद्भुत संगम है।
