“A poor man never dreams for himself, only for his children” – Story of a Gujarat auto driver leaves many shaken
यह कहानी गुजरात के एक Reddit यूज़र ने शेयर की, जिसने देर रात घर लौटते समय एक भावुक अनुभव किया। रात के 11 बजे के बाद वह ऑटो से घर जा रहा था। ऑटो चालक एक बुज़ुर्ग व्यक्ति था, थका-हारा दिख रहा था, लेकिन फिर भी लगातार चला रहा था।
जब उससे पूछा गया कि वह इतनी देर रात तक क्यों काम कर रहा है, तो ड्राइवर हल्की कड़वी हंसी हंसते हुए बोला—“दो बेटियां हैं। एक की कोचिंग फीस भरनी है और दूसरी की स्कूल की फ़ीस देनी है।”
उसने बताया कि वह रोज़ाना करीब ₹700–800 कमाता है, जिसमें से आधा पेट्रोल और किराये में चला जाता है। ताकि बेटियों की पढ़ाई जारी रहे, वह रोज़ 14–16 घंटे तक गाड़ी चलाता है। यह सुनकर Reddit यूज़र का दिल भर आया।
यूज़र ने लिखा—“मैं चुप हो गया। मैं अपनी कॉर्पोरेट नौकरी की शिकायत कर रहा था और ये इंसान रोज़ 14–16 घंटे गाड़ी चला रहा था ताकि उसकी बेटियों का भविष्य बेहतर हो सके।”
The kind of India we ignore
byu/Specialist_Meaning73 inindia
सफ़र के दौरान ड्राइवर ने एक ऐसी बात कही, जिसने यूज़र को गहराई से छू लिया—
“गरीब आदमी अपने लिए कभी सपने नहीं देखता, केवल अपने बच्चों के लिए। मेरे लिए तो यही दुआ है कि कल भी मुझमें गाड़ी चलाने की ताक़त रहे।”
घर पहुंचने पर Reddit यूज़र ने अतिरिक्त पैसे देने की कोशिश की। पहले तो ड्राइवर ने मना कर दिया, लेकिन बाद में हाथ जोड़कर स्वीकार कर लिया और कहा—“आपको भी ख़ुदा ताक़त दे।”
यूज़र ने लिखा—“मैं ऊपर कमरे में गया, बिस्तर पर बैठा और बस सोचता रह गया। हम रोज़ ट्रैफ़िक, बॉस, डेडलाइन और लेट डिलीवरी की शिकायतें करते रहते हैं। और उसी समय हमारे आसपास हज़ारों लोग हैं, जो अपने बच्चों को हमसे बेहतर जीवन देने के लिए अपनी हड्डियां तक तोड़ रहे हैं।”
उसने महसूस किया कि उसकी सबसे बड़ी ‘प्रिविलेज’ पैसा या अंग्रेज़ी बोलने वाली नौकरी नहीं है।
“शायद हमारी सबसे बड़ी प्रिविलेज यह है कि हमें अपने लिए सपने देखने की आज़ादी मिली है।”
सिस्टम बदलाव की मांग
इस पोस्ट पर आए रिएक्शन्स बेहद भावुक रहे। कई लोगों ने सिस्टम में बदलाव की ज़रूरत बताई।
एक यूज़र ने लिखा—“किसी भी समझदार देश में ग्रेजुएशन तक की शिक्षा मुफ़्त होनी चाहिए। देश को सबसे ज़्यादा फायदा पढ़ी-लिखी आबादी से होता है। आप देख लीजिए, जिन देशों में ऐसा है, वे अमीर और कम भ्रष्ट हैं।”
दूसरे ने लिखा—“यह हमें हमारी प्रिविलेज की याद दिलाता है। हम जो चीज़ें हल्के में लेते हैं, कई लोग उनके लिए अपनी ज़िंदगी झोंक देते हैं।”
एक और कमेंट था—“यह हमारे हालातों की भयावह तस्वीर है कि किसी पिता को अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए अपनी कमर तोड़नी पड़ती है।”
अलग नज़रिया
कुछ यूज़र्स ने अलग राय रखी।
एक ने कहा—“अगर आप बच्चों को अच्छा खाना, कपड़े, शिक्षा और बेहतर माहौल नहीं दे सकते, तो उन्हें दुनिया में लाने का हक़ नहीं है। सिर्फ़ प्यार ही काफ़ी नहीं होता।”
एक यूज़र, जिसने निचले मध्यमवर्गीय माहौल में परवरिश पाई थी, ने लिखा—
“मुझे लगातार आर्थिक संघर्ष, गंदे और जर्जर घर में रहना, लोकल ब्रांड्स खाना बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। ज़िंदगी बहुत नाइंसाफ़ है… अगर मुझे मौका मिले और मैं पीछे जाकर अपनी ज़िंदगी चुन सकूं… तो शायद मैं ये जीवन नहीं चुनता।”
