डीएनए से जैविक संबंध न साबित हो तो बच्चे का भरण-पोषण नहीं: सुप्रीम कोर्ट

by cityplusnews · April 23, 2026
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Supreme Court of India ने एक अहम फैसले में कहा है कि यदि डीएनए टेस्ट से यह साबित हो जाए कि पति बच्चे का जैविक पिता नहीं है, तो उससे बच्चे के भरण-पोषण (मेंटेनेंस) के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, भले ही बच्चा विवाह के दौरान जन्मा हो।

यह फैसला जस्टिस Sanjay Karol और जस्टिस N. Kotiswar Singh की बेंच ने दिया, जिसने महिला की अपील खारिज करते हुए निचली अदालतों और Delhi High Court के फैसले को बरकरार रखा।

क्या था मामला?

दंपति की शादी 2016 में हुई थी, लेकिन बाद में विवाद पैदा हो गया। महिला ने Protection of Women from Domestic Violence Act, 2005 के तहत अपने और बच्चे के लिए अंतरिम भरण-पोषण की मांग की।

सुनवाई के दौरान पति ने पितृत्व साबित करने के लिए डीएनए टेस्ट की मांग की। अदालत की अनुमति के बाद हुए टेस्ट में सामने आया कि वह बच्चे का जैविक पिता नहीं है।

इसी आधार पर ट्रायल कोर्ट ने बच्चे के लिए मेंटेनेंस देने से इनकार कर दिया, जिसे बाद में उच्च अदालतों ने भी सही ठहराया।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

कोर्ट ने Indian Evidence Act, 1872 की धारा 112 (अब Bharatiya Sakshya Adhiniyam की धारा 116) पर विचार किया, जिसके तहत विवाह के दौरान जन्मे बच्चे को वैध माना जाता है।

हालांकि अदालत ने कहा कि जब विश्वसनीय वैज्ञानिक सबूत मौजूद हो, तो वह कानूनी अनुमान पर भारी पड़ सकता है।

कोर्ट ने कई पुराने फैसलों का भी हवाला दिया, जिनमें कहा गया था कि वैज्ञानिक साक्ष्य कुछ मामलों में कानूनी धारणा को चुनौती दे सकता है।

यह मामला अलग क्यों था?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस केस में डीएनए टेस्ट महिला की सहमति से हुआ था और उसकी रिपोर्ट को कभी चुनौती नहीं दी गई। इसलिए उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

इसी आधार पर अदालत ने माना कि पति पर बच्चे के भरण-पोषण की जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती।

बच्चे के हित पर भी जोर

हालांकि कोर्ट ने अपील खारिज कर दी, लेकिन Delhi Women and Child Development Department को बच्चे की शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और रहने की स्थिति की जांच करने का निर्देश भी दिया। जरूरत पड़ने पर सहायता सुनिश्चित करने को कहा गया।

फैसला क्यों अहम है?

यह फैसला पितृत्व विवाद वाले भरण-पोषण मामलों में भविष्य के लिए मिसाल बन सकता है। साथ ही कोर्ट ने साफ किया कि बच्चे का कल्याण राज्य की अलग जिम्मेदारी है।

Disclaimer:
यह खबर केवल जानकारी के लिए है, इसे कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी मामले में विशेषज्ञ कानूनी सलाह लेना जरूरी है।

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