Delhi HC: Homemaker Wife Cannot Claim Ownership of Husband’s Property Without Financial Contribution
दिल्ली हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि यदि पत्नी किसी संपत्ति की खरीद में प्रत्यक्ष रूप से आर्थिक योगदान साबित नहीं कर पाती है, तो केवल गृहिणी होने के आधार पर वह पति की संपत्ति पर स्वामित्व अधिकार का दावा नहीं कर सकती।
मामला
यह फैसला उस समय आया जब एक महिला ने फैमिली कोर्ट्स एक्ट, 1984 की धारा 19(1) के तहत अपील दायर की थी। उसने रोहिणी पारिवारिक न्यायालय के 16 जुलाई 2025 के आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसके पति के नाम पर दर्ज गुरुग्राम के एक फ्लैट पर स्वामित्व और निषेधाज्ञा (injunction) संबंधी उसका दावा खारिज कर दिया गया था।
कोर्ट की टिप्पणी
पीठ ने कहा कि पत्नी का गृहिणी के रूप में योगदान निस्संदेह मूल्यवान है, लेकिन जब तक वित्तीय योगदान का ठोस प्रमाण नहीं होता, तब तक वह कानूनी स्वामित्व में नहीं बदल सकता।
कोर्ट ने स्पष्ट किया:
“पति की संपत्ति पर वैध और लागू दावा तभी हो सकता है जब सार्थक और ठोस योगदान का प्रमाण हो। ऐसे प्रमाण के अभाव में, स्वामित्व उसी व्यक्ति का रहेगा जिसके नाम पर संपत्ति दर्ज है, सिवाय उन मामलों के जहां कानून या न्यायसंगत अपवाद लागू होते हैं।”
न्यायाधीशों ने आगे यह भी कहा कि भले ही वैधानिक प्रावधान पत्नी को साझा वैवाहिक घर से मनमाने ढंग से बेदखल होने से बचाते हैं, लेकिन घर में रहने का अधिकार स्वामित्व के अधिकार के बराबर नहीं है।
पिछले फैसलों पर भरोसे को खारिज
अपीलकर्ता ने कन्नैयन नायडू बनाम कमसला अम्मल (2023) के मद्रास हाईकोर्ट के फैसले का हवाला दिया। दिल्ली हाईकोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि उस मामले में पत्नी की संपत्ति खरीद में प्रत्यक्ष सहभागिता और वित्तीय योगदान साबित था। इसके विपरीत, मौजूदा मामले में केवल “खाली दावे” थे, कोई ठोस सबूत नहीं।
गृहिणियों के योगदान की मान्यता
दिल्ली हाईकोर्ट ने स्वीकार किया कि गृहिणियों के अदृश्य और बिना वेतन के योगदान को समाज में अक्सर कम आंका जाता है।
पीठ ने कहा:
“अब समय आ गया है कि ऐसे योगदानों को सार्थक परिणाम तक पहुँचाया जाए। संभव है कि भविष्य में विधानमंडल (legislature) ऐसे उपाय करे जिससे गृहिणियों का योगदान वास्तविक रूप से प्रतिबिंबित हो… लेकिन तब तक अदालत केवल गृहिणी होने के आधार पर स्वामित्व अधिकार प्रदान नहीं कर सकती।”
नतीजा
हाईकोर्ट ने अपील खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि पत्नी द्वारा घर संभालने और बच्चों को पालने का त्याग और समर्पण अमूल्य है, लेकिन केवल इन्हीं आधारों पर पति की अचल संपत्ति पर कानूनी स्वामित्व अधिकार नहीं बनता।
